Movie Review ! Sharmaji Namkeen ! ऋषि कपूर की क्यूटनेस और परेश रावल की मासूमियत, 'शर्माजी नमकीन' को बनाती हैं बेहद स्वादिष्ट , चटकारे लेकर देख डालिए

Movie Review ! Sharmaji Namkeen ! ऋषि कपूर की क्यूटनेस और परेश रावल की मासूमियत, 'शर्माजी नमकीन' को बनाती हैं बेहद स्वादिष्ट , चटकारे लेकर देख डालिए

Anupriya Verma

मैंने जब से होश संभाला है, मैंने मेरे पापा को कभी थकते हुए या शिकायत करते हुए नहीं देखा कि उन्हें यह नहीं मिला, वह नहीं मिला, उन्हें मैंने जब देखा है, एक्टिव ही देखा है। पापा को रिटायर हुए अब कई साल हो गए हैं, लेकिन शुक्र है कि पापा ने आज भी एक्टिव रहना नहीं छोड़ा है। हाँ, मेरे पापा कोई योग मास्टर नहीं हैं,  हेल्थ कॉन्सस भी नहीं कहूँगी उन्हें, लेकिन हाँ, उनके अंदर का जो दिल है, वह उनके दिमाग को हमेशा कहते रहता है कि एक्टिव रहें, फिर चाहे वह जिस रूप में भी हो। कई बार मैंने उन्हें समझाया,  पापा कभी आराम भी किया कीजिए, तो वह कहते हैं कि मैं आराम करूँगा तो ज्यादा थक जाऊंगा, सो मैं जैसा हूँ, रहने दो। वह न सिर्फ अपने घर के कामों में सबकी मदद करते हैं, बल्कि मोहल्ले में भी अगर किसी को बिजली विभाग या किसी अन्य डिपार्टमेंट में काम हो, तो अपनी स्कूटर निकालते हैं और सहयोग कर देते हैं।  पहले मेरे जेहन में यह बातें नहीं आती थी, लगता था, उन्हें हक़ है कि इतने सालों काम करने के बाद, अब आराम करें, लेकिन ईमानदारी से कहती हूँ कि मैंने जब हितेश भाटिया की फिल्म शर्माजी नमकीन देखी और फिल्म के मुख्य किरदार, शर्माजी, जिनका किरदार परेश रावल और ऋषि कपूर ने  निभाया है,  उन्हें देखा, तो मुझे ऐसा लगा फ्लैशबैक में मैं मेरे पापा को ही देख रही हूँ। शर्माजी को तो  फिल्म में वीआरएस रिटायरमेंट दे दी जाती है। फिर एक एक्टिव रहने वाला इंसान किस तरह अपनी दिनचर्या बिताता है, एक सिम्पल से विषय पर एक अनोखी कहानी हितेश ने बनाई है। शर्माजी का यह सवाल बेहद वाजिब है कि सरकार तो रिटायरमेंट का समय 60 साल निर्धारित कर देती है, लेकिन क्या दिमाग  60 का होने पर काम करना बंद कर देता है, जो काम करना बंद कर दें। एक रिटायर आदमी की जिंदगी में झाँकने की यह मासूम कोशिश जो हितेश ने की है, वह उन तमाम रिटायर इंसान के चेहरे पर एक स्माइल तो लाएगा ही, साथ ही उनके बच्चों पर भी कटाक्ष करती है, जिनकी नजर में रिटायर माँ बाप की हैसियत बिजली बिल और घर के बाकी जिम्मेदारी सँभालने के लिए रह जाती है।  

मुमकिन है कि इस फिल्म को देखने के बाद, आप अपने परिवार के रिटायर इंसान से दो पल बैठ कर बात करने की कोशिश जरूर करेंगे और अगर आप ऐसा करते हैं, तो फिल्म के निर्देशक का मकसद कुछ हद तक पूरा हो।  बॉलीवुड में ऐसी कितनी फिल्में बनी हैं, जिसमें एक रिटायर आदमी की जिंदगी और दिल में झाँकने की कोशिश की गई हो, हितेश की फिल्म ऐसी है, जैसी उनके अकेलेपन में किसी ने उनसे दो पल बात करने की कोशिश की हो।

क्राइम, थ्रिलर और लव स्टोरी से इतर, अगर आपको अपने परिवार के साथ कोई फिल्म देखने की चाहत है, तो मेरा यकीन कीजिये, यह फिल्म आपके लिए बेस्ट ट्रीट होगी, मैं ऐसा क्यों कह रही हूँ, इस रिव्यू में बता रही हूँ। साथ ही निर्देशक इस बात के लिए बधाई के पात्र हैं कि उन्होंने ऋषि कपूर को एक शानदार ट्रिब्यूट दिया है, हिंदी सिनेमा में एक ही किरदार को दो दिग्गज कलाकारों द्वारा निभाना, इस फिल्म को और रोचक बनाता है और यह एक नया प्रयोग है, जिसकी सराहना होनी चाहिए।

क्या है कहानी

कहानी पुरानी दिल्ली के एक मीडिल क्लास रिटायर आदमी बीजी शर्मा ( ऋषि कपूर और परेश रावल) की है। वह एक मिक्सर की कम्पनी में काम करता था, लेकिन उसे दो साल पहले ही वीआरएस रिटायरमेंट दे दिया गया है। शर्मा जी घर में यूं ही बैठने में यकीन नहीं रखते हैं, वह वैसे तमाम नुस्खे अपनाते रहते हैं, जिससे वह खुद को व्यस्त रख सकें,  उन्होंने स्मार्ट फोन भी ले रखा है, हर दिन दोस्तों को फ़ॉर्वर्डेड मेसेज करते हैं, लेकिन दुनिया के बाकी बोरिंग लोगों की तरह वह दिन काटना नहीं पसंद करते हैं। ऐसे में ब्रोकर से लेकर, ट्यूशन क्लासेज और ऐसी कई चीजें ट्राई करने के बावजूद शर्माजी का कहीं दिल नहीं लगा। उनके घर पर दो बच्चे हैं, रिंकू (सुहेल ) एक कम्पनी में काम करता है और हाई क्लास घरों से संबंध  रखने वाली उर्मि ( दिशा तलवार) से प्रेम में है, दोनों ने फ़्लैट भी बुक कर लिया है, जबकि शर्मा जी को वह घर नहीं छोड़ना है, क्योंकि पत्नी सुमन की यादें हैं उस घर में। बहरहाल, दोनों बच्चों को अपने पापा के अजीबोगरीब हरकतों से परेशानी है, उनका कहना है कि वह चैन से क्यों नहीं बैठते हैं। शर्माजी यही बात अपने बच्चों को समझा नहीं पाते हैं कि वह चैन से नहीं बैठना चाहते। इन सबके बीच, शर्माजी जो कि खाना बनाने के भी शौक़ीन हैं, उन्हें एक दोस्त चड्डा(सतीश कौशिक) के माध्यम से एक किटी मण्डली में खाना बनाने का ऑफर मिलता है और वहां वह अपना जलवा दिखाते हैं। वहीं उनकी मुलाक़ात दिलचस्प महिलाओं से होती है, जिनमें मिसेज मनचंदा (जूही चावला) से उनका खास लगाव हो जाता है। बेटे रिंकू से शर्माजी यह सब छुपा छुपा कर रहे होते हैं, एक दिन उनकी पोल खुलती है और रिंकू अपने पिताजी की बहुत  बेइज्जती करती है, लेकिन जब वह एक फ्लैट स्कैम में फंसता है, तो कैसे शर्माजी की मण्डली ही उसके काम आती है, यह देखना दिलचस्प है।

बातें जो मुझे अच्छी लगीं

  • सबसे पहले तो निर्देशक इसलिए बधाई के पात्र हैं कि उन्होंने ऋषि कपूर को रिप्लेस करने की बजाय एक बड़ा सम्मान दिया है और उनके फैंस के लिए एक आखिरी बार, उन्हें इस फिल्म से बड़े परदे पर देखने का मौका दिया है, निर्माता टीम की भी तारीफ़ होनी चाहिए कि उन्होंने यह जोखिम लिया कि एक किरदार दो एक्टर निभाएं। परेश रावल ने इस जिम्मेदारी को बिना किसी हिचक के पूरा किया है, परेश ने फिल्म को उस वक़्त संभाला, जब ऋषि कपूर इस फिल्म की आधी शूटिंग के बाद ही बीमार हो गए थे और फिर उनकी मृत्यु हो गई। ऐसे में मेकर्स ने फिल्म को बंद करने की बजाय, जब परेश से बात की, तो उन्होंने न नहीं कहा और यह खूबसूरत फिल्म हम सबके सामने आयी। इसलिए परेश को इस फिल्म के लिए एक्स्ट्रा बधाई दी जानी चाहिए।
  • फिल्म आपको हर लिहाज से इमोशनल करेगी। आप अपने इर्द-गिर्द के हर उस इंसान का चेहरा याद करेंगे, जिन्हें रिटायरमेंट के बाद, हमने घर के एक कोने में पड़े सोफे पर अकेले जीने के लिए छोड़ दिया है, जैसे उनकी कोई अहमियत या वजूद ही न हो।
  • यह फिल्म हर उस रिटायर इंसान, जो यह मान बैठे हों कि जिंदगी खत्म हो गई है, उनमें फिर से ऊर्जा भरेंगे। रिटायरमेंट जिंदगी का अंत नहीं है, इस उद्देश्य को सार्थक रूप से स्थापित करती है फिल्म।
  • फिल्म में किटी पार्टी करती हुईं औरतों की जिंदगी को भी एक नया नजरिया दिया गया है, जहाँ महिलाएं अपनी चाहत, अपनी तम्माओं को पर देने की बात करती हैं, वहां सिर्फ गॉसिप और पार्टियां नहीं होती हैं।
  • जिंदगी के इस पड़ाव में भी अगर कोई अच्छा साथी मिले, तो फ़ौरन उसका हाथ थाम लेना चाहिए, यह भी बात फिल्म दर्शाती है।
  • यह फिल्म उन बच्चों के लिए सबक है, जिन्हें ऐसा लगता है कि अपने स्मार्ट फोन की तरह ही वह सबसे स्मार्ट हैं और उन्हें पूरी दुनिया की जानकारी है और उनके पापा कुछ नहीं।
  • किसी भी इंसान को अपने अंदर के हुनर को दबाना नहीं चाहिए और सोसाइटी की फ़िक्र तो हरगिज नहीं करनी चाहिए, यह फिल्म यह भी संदेश देती है।

  • फिल्म कोई बड़ी फिल्म या ओवर द टॉप जाने की कोशिश नहीं करती है, यही इस फिल्म की खूबसूरती है। फिल्म में जो माहौल, परिवेश, हालात, स्थितियां हैं, वह वैसी ही हैं, जैसी मिडिल क्लास में स्वाभाविक रूप से होती हैं, फिल्म की मासूमियत ही फिल्म की सबसे बड़ी यूएसपी है।
  • फिल्म का ह्यूमर सिचुएशनल है और एकदम सहज संवाद भी आपको हंसने पर मजबूर करेंगे।
  • ऋषिकेश मुखर्जी की फिल्मों की याद दिला देगी यह फिल्म।
  • फिल्म में एक जगह शर्माजी अपने बेटे से पूछते हैं कि तुम्हें शर्म आती है, तुम्हारे बारे में सोचना चाहिए था, यानी सबकुछ तुम्हारे बारे में हो, मेरे बारे में कुछ नहीं। निर्देशक ने यहाँ एक स्पष्ट सोच दर्शाई है कि भले ही आप किसी भी जिम्मेदारी में हों, लेकिन आपको कभी अपने आप को नहीं भूलना चाहिए और खुद को तवज्जो देना चाहिए, वरना दुनिया आपको फॉर ग्रांटेड ही लेती है।
  • यह फिल्म इसलिए भी सराही जानी चाहिए कि यह उस हर एक मिडिल इंसान की बायोपिक है, जो ताउम्र अपने बच्चों की जिम्मेदारियों को पूरा करते हुए खुद के लिए समय नहीं निकाल पाता है और फिर रिटायरमेंट के बाद, जब वह कुछ करना चाहता है, तो परिवार की इज्जत, समाज उनके सामने काँटा बन कर खड़ा हो जाता है।
  • फिल्म में रणबीर कपूर का भी कनेक्शन है, लेकिन क्या, यह मैं नहीं बताऊंगी, यह आपको फिल्म देखने पर ही पता चलेगा।

बातें जो और बेहतर हो सकती थीं

इसमें कोई संदेह नहीं है कि कहानी अधिक मेलोड्रामा दिखाने की कोशिश नहीं करती है। लेकिन फिल्म में थोड़े इमोशनल दृश्य या कुछ और घटनाओं का बिल्ड अप किया जाता तो शर्माजी का व्यक्तित्व और अधिक उभर कर सामने आता।

अभिनय

ऋषि कपूर ने इस फिल्म में ऐसा किरदार निभाया है, जैसे उनको मालूम हो कि यह उनकी आखिरी फिल्म है। हर सीन में वह परफेक्ट दिखे हैं, फिर चाहे वह किचन में खाना बनाते हुए कूक हों या फिर एक मिडिल क्लास पिता। एक पिता के अंदर के द्वन्द को और एक रिटायर आदमी की चाहत दोनों की भावना को खूबसूरती से पर्दे पर उकेरा है। परेश रावल जिन दृश्यों में भी नजर आये हैं, उन्होंने कहानी में जान डाल दी है। फिल्म में जूही चावला का किरदार बेहद सहज है, लेकिन इमोशन से भरपूर है, जो अपने परिवार के न होने से दुखी भी है, लेकिन जीना नहीं छोड़ती है और दूसरों की जिंदगी में भी रंग भरती है। ऋषि और परेश दोनों के साथ उनकी केमेस्ट्री लाजवाब है।  फिल्म का असली मजा शीबा चड्डा और आयेशा रजा के बिना नहीं हो सकता था, यह दोनों कमाल की अभिनेत्रियां हैं, ऐसा क्या है, जो यह नहीं कर सकती हैं। सुहेल और सतीश कौशिक का काम ठीक है। शेष कलाकारों ने भी चंद दृश्यों में अपनी सार्थक छाप छोड़ी है।

फिल्म : शर्माजी नमकीन

कलाकार : ऋषि कपूर, परेश रावल, जूही चावला, शीबा चड्डा, आयेशा रजा, सुहेल नैय्यर

निर्देशक : हितेश भाटिया

ओटीटी चैनल : अमेजॉन प्राइम वीडियो

मेरी रेटिंग 5 में से  3 . 5 स्टार्स